
India’s energy security on alert amid Iran-Israel tensions: Oil stock for only 25 days, will purchases from Russia increase?पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान-इजराइल टकराव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। सरकारी सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्ट के मुताबिक, देश के पास फिलहाल कच्चे तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का करीब 25 दिनों का स्टॉक बचा है। हालांकि केंद्र सरकार ने साफ किया है कि फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने की कोई योजना नहीं है।
स्थिति इसलिए गंभीर मानी जा रही है क्योंकि ईरान ने दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक, Strait of Hormuz को बंद करने का ऐलान किया है। ओमान और ईरान के बीच स्थित यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल सप्लाई का प्रमुख केंद्र है। यहां से गुजरने वाले जहाजों को लेकर ईरानी सेना की कड़ी चेतावनी ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल बढ़ा दी है।
क्यों अहम है स्ट्रैट ऑफ होर्मुज?
दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रूट से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो एशियाई देशों—खासकर भारत, चीन और जापान—पर सीधा असर पड़ता है। इसी आशंका के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है और भाव 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुके हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि हालात बिगड़ने पर कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं।
सरकार का रुख: फिलहाल पेट्रोल-डीजल महंगे नहीं होंग
ऊर्जा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश की जा रही है। मंत्रालय ने भरोसा दिलाया है कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और आम जनता को राहत देने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
सोमवार को केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री Hardeep Singh Puri ने वरिष्ठ अधिकारियों और सरकारी तेल कंपनियों के साथ उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। बैठक में कच्चे तेल, एलपीजी और अन्य ईंधनों की सप्लाई स्थिति पर विस्तार से चर्चा की गई। मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि सरकार हालात पर लगातार नजर बनाए हुए है।
एक्सपोर्ट-इंपोर्ट और शिपिंग सेक्टर पर असर
पश्चिम एशिया में तनाव का असर केवल तेल तक सीमित नहीं है। वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाले Directorate General of Foreign Trade (DGFT) ने भी स्टेकहोल्डर्स के साथ बैठक कर एक्सपोर्ट-इंपोर्ट पर संभावित असर की समीक्षा की।
लॉजिस्टिक कंपनियों और शिपिंग लाइनों ने बताया कि तनाव के कारण जहाजों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ रहे हैं, जिससे ट्रांजिट टाइम और इंश्योरेंस लागत बढ़ रही है। सरकार ने दस्तावेजी प्रक्रिया आसान बनाने और कार्गो मूवमेंट में देरी कम करने के निर्देश दिए हैं।
भारत की तेल निर्भरता: क्यों बढ़ी चिंता
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का करीब 85% आयात करता है। पश्चिम एशिया भारत के लिए प्रमुख आपूर्तिकर्ता क्षेत्र रहा है। ऐसे में वहां किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई दर और राजकोषीय संतुलन पर पड़ता है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है, इसलिए सप्लाई चेन में मामूली व्यवधान भी व्यापक आर्थिक प्रभाव डाल सकता है।
रूस से बढ़ेगी तेल खरीद?
ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में अनिश्चितता बढ़ने के बाद भारत एक बार फिर रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। भारत उन रूसी टैंकरों को खरीदने पर विचार कर रहा है जो फिलहाल एशियाई समुद्री क्षेत्र के आसपास मौजूद हैं।
बताया जा रहा है कि लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल टैंकरों में लोड होकर एशियाई जलक्षेत्र में प्रतीक्षा कर रहा है। जरूरत पड़ने पर भारत इन कार्गो को तुरंत रिसीव कर सकता है, जिससे सप्लाई समय और परिवहन लागत दोनों कम होंगी।
रूस भारत के लिए क्यों अहम?
1. सस्ता विकल्प: रूस भारत को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क से कम कीमत पर तेल ऑफर करता है।
2. सप्लाई सुरक्षा: मध्य पूर्व में तनाव की स्थिति में रूस अपेक्षाकृत स्थिर आपूर्ति विकल्प देता है।
3. महंगाई नियंत्रण: सस्ता कच्चा तेल मिलने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
रूस का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार भार
दिसंबर 2025 में भारत रूस से तेल खरीदने के मामले में तीसरे स्थान पर रहा। चीन पहले और तुर्किये दूसरे नंबर पर रहे। दिसंबर में भारत ने रूस से करीब 2.3 बिलियन यूरो का कच्चा तेल खरीदा, जो नवंबर की तुलना में कम था। खरीद में कमी की एक बड़ी वजह निजी और सरकारी कंपनियों द्वारा सावधानी बरतना माना जा रहा है।
रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी ने रूस से आयात में कटौती की है। पहले कंपनी रूस की रोसनेफ्ट से बड़ी मात्रा में तेल खरीदती थी, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की आशंका के चलते कंपनियों ने खरीद घटाई है।
आगे क्या?
अगर Strait of Hormuz लंबे समय तक बंद रहता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। ऐसे में भारत के लिए सप्लाई स्रोतों में विविधता लाना, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाना और वैकल्पिक व्यापार मार्गों की खोज करना बेहद जरूरी होगा।
फिलहाल सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत दी है, लेकिन वैश्विक हालात को देखते हुए आने वाले हफ्ते भारत की ऊर्जा नीति के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं।









