
देश की प्रमुख राइड-हेलिंग कंपनियों ओला और उबर को उस समय बड़ा झटका लगा, जब ड्राइवर-पार्टनर्स ने कम कमाई, बढ़ते कमीशन और महंगे ऑपरेशनल खर्चों के खिलाफहड़ताल शुरू कर दी। इस हड़ताल का असर कई बड़े शहरों में देखने को मिला, जहां कैब की उपलब्धता कम रही और यात्रियों को लंबा इंतजार करना पड़ा। ड्राइवर संगठनों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे हैं, लेकिन कंपनियों की ओर से कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया। इसी वजह से उन्हें सामूहिक रूप से हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा।
हड़ताल की मुख्य वजहें
ड्राइवरों के अनुसार, ओला-उबर द्वारा बार-बार किराया और इंसेंटिव पॉलिसी में बदलाव किए जाने से उनकी कमाई अस्थिर हो गई है।
ईंधन की बढ़ती कीमतें, वाहन की मेंटेनेंस लागत और EMI का बोझ ड्राइवरों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर रहा है।
ड्राइवर यूनियन का कहना है कि वे तकनीक के विरोधी नहीं हैं, लेकिन सम्मानजनक और स्थायी आमदनी चाहते हैं।
यात्रियों पर पड़ा असर
हड़ताल के कारण कई शहरों में
- कैब बुकिंग में दिक्कत
- लंबा वेटिंग टाइम
- पीक ऑवर्स में किराया बढ़ना
जैसी समस्याएं सामने आईं। ऑफिस जाने वाले कर्मचारियों, यात्रियों और एयरपोर्ट जाने वालों को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ा।
Ola और Uber का पक्ष
ओला और उबर दोनों कंपनियों ने सेवा प्रभावित होने की बात स्वीकार की है। कंपनियों का कहना है कि वे ड्राइवर-पार्टनर्स के साथ लगातार बातचीत कर रही हैं और उनकी समस्याओं का समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है।
कंपनियों ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका लक्ष्य ड्राइवरों की भलाई और यात्रियों की सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखना है।
सरकार और गिग इकोनॉमी पर सवाल
यह हड़ताल एक बार फिर गिग इकोनॉमी में काम करने वाले ड्राइवरों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा को लेकर बहस को तेज कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक न्यूनतम आय, बीमा और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट नीति नहीं बनती, तब तक ऐसे आंदोलन आगे भी देखने को मिल सकते हैं।
आगे क्या?
ड्राइवर संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो हड़ताल को और तेज किया जा सकता है। वहीं यात्रियों को सलाह दी गई है कि वे यात्रा से पहले वैकल्पिक साधनों की योजना बनाकर रखें।










