
Supreme Court hearing on stray dogs, सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों पर गुरुवार को लगातार दूसरे दिन करीब ढाई घंटे तक सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट में कुत्तों के व्यवहार, सार्वजनिक सुरक्षा, एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम और देश में मौजूद शेल्टर इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर विस्तार से चर्चा हुई।
कुत्तों के व्यवहार को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच में शामिल जस्टिस नाथ ने कुत्तों के व्यवहार को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कुत्ते इंसानों के डर को पहचान लेते हैं और अक्सर डरने वाले लोगों पर ज्यादा आक्रामक हो जाते हैं। जब एक वकील ने इस बात से असहमति जताई, तो जस्टिस नाथ ने स्पष्ट किया कि यह उनका व्यक्तिगत अनुभव है। मामले पर 9 जनवरी को सुबह 10:30 बजे फिर से सुनवाई होगी।
शेल्टर होम और इंफ्रास्ट्रक्चर पर सवाल
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि राज्यों द्वारा दिए गए आंकड़ों में यह स्पष्ट नहीं है कि नगर पालिकाएं या सरकारें कितने शेल्टर होम चला रही हैं। देश में फिलहाल सिर्फ 5 सरकारी शेल्टर मौजूद हैं और हर एक की क्षमता लगभग 100 कुत्तों की है। ये शेल्टर भी केवल बीमार और घायल कुत्तों के लिए हैं। ऐसे में कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद नहीं है।
कुत्तों को हटाने पर एनिमल वेलफेयर की आपत्ति
एनिमल वेलफेयर की ओर से दलील देते हुए वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने कहा कि अगर आवारा कुत्तों को बड़े पैमाने पर हटाया गया, तो चूहों की आबादी तेजी से बढ़ेगी, जिससे बीमारियों का खतरा होगा। इस पर कोर्ट ने हल्के-फुल्के अंदाज में पूछा—“तो क्या बिल्लियां ले आएं?”
पिछले आदेश और मौजूदा स्थिति
गौरतलब है कि नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स जैसे संवेदनशील इलाकों से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें तय शेल्टर होम में स्थानांतरित करने का आदेश दिया था। पिछले सात महीनों में इस मुद्दे पर अब तक छह बार सुनवाई हो चुकी है।
सुनवाई के दौरान सामने आईं 6 बड़ी बातें
मालिकाना जिम्मेदारी का सवाल वकील ने कहा कि पालतू कुत्ते का मालिक होता है, लेकिन आवारा कुत्तों का कोई मालिक नहीं होता। राज्य की जिम्मेदारी वैक्सीनेशन और नसबंदी तक सीमित होनी चाहिए। ABC नियम ऐसे हों कि आम नागरिक सुरक्षित रूप से अपने घर तक जा सके।
रिहायशी इलाकों में भी आदेश लागू हों
कुत्तों को हटाने के पक्ष में वकील ने कहा कि अदालत का आदेश सिर्फ संस्थानों तक सीमित न रहे, बल्कि रिहायशी इलाकों पर भी लागू हो। हर डॉग लवर या NGO के लिए तय फीस की शर्त पर कोर्ट ने कहा कि अगर यह शर्त न होती, तो याचिकाओं की बाढ़ आ जाती। आखिरी बार 2009 में कुत्तों की जनगणना हुई थी। सिर्फ दिल्ली में उस समय 5.6 लाख कुत्ते थे। बिना कैपेसिटी के जानवरों को पकड़ना व्यावहारिक नहीं है।
चूहे और बंदरों का तर्क
वकील ने कहा कि कुत्ते हटाने से चूहे और बंदरों का खतरा बढ़ सकता है। कोर्ट ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि संतुलन का यह रिश्ता तर्कसंगत नहीं लगता। कोर्ट ने साफ किया कि हर कुत्ते को सड़क से हटाने का निर्देश नहीं दिया गया है। नियमों के तहत मानवीय और व्यावहारिक समाधान जरूरी है।










