भारत का Aditya-L1 और ‘Gannon Storm’

भारत का Aditya-L1 और ‘Gannon Storm’
भारत का Aditya-L1 और ‘Gannon Storm’

भारत का पहला सौर वेधशाला मिशन Aditya-L1 ने मई 2024 में आए अत्यंत शक्तिशाली भू-चुम्बकीय सौर तूफान, जिसे “Gannon Storm” कहा गया, को समझने में निर्णायक भूमिका निभाई। इस घटना के अध्ययन में Aditya-L1 द्वारा दिए गए सटीक चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) मापों ने विश्व के वैज्ञानिकों को यह जानने में मदद की कि यह तूफान सामान्य से अधिक शक्तिशाली कैसे बन गया।

मई 2024 का Gannon Storm पिछले 20 वर्षों का सबसे तीव्र सौर/भू-चुम्बकीय तूफान माना जा रहा है।

Aditya-L1 ने रीयल-टाइम और बहुत सटीक Magnetic Field डेटा उपलब्ध कराकर घटना के गुज़रने के मार्ग और उसमें होने वाली magnetic reconnection प्रक्रिया का मानचित्र तैयार करने में मदद की।

दो Coronal Mass Ejections (CMEs) के बीच टकराव और उनमें हुई चुंबकीय पुनर्संयोजन (magnetic reconnection) ने तूफान की शक्ति को असामान्य रूप से बढ़ा दिया।

घटना का अध्ययन कई उपग्रहों के साथ मिलकर किया गया — जिससे कई vantage points पर एक साथ डेटा मिला और समझ गहरी हुई।

घटना का वैज्ञानिक परिदृश्य चरण दर चरण

1) CME क्या है?

Coronal Mass Ejection (CME) सूर्य से निकलने वाला प्लाज़्मा-और-चुंबकीय क्षेत्र का विशाल बुलबुला होता है। जब ये बुलबुले पृथ्वी की ओर आते हैं और हमारे मैग्नेटोस्फियर से टकराते हैं, तो वे उपग्रह प्रणाली, संचार, नेविगेशन और बिजली ग्रिड पर प्रभाव डाल सकते हैं।

2) Gannon Storm कैसे बना — असामान्य क्रम

मई 2024 में सूर्य से निकले एकाधिक बड़े CMEs ने अंतरिक्ष में यात्रा की।

इन CMEs में से दो इतने करीबी और शक्तिशाली थे कि वे स्पेस में एक दूसरे से टकरा गए।

टकराने के बाद उनमें मौजूद चुंबकीय क्षेत्र-रेखाएँ (magnetic field lines) टूटकर (break) फिर नए तरीके से जुड़ने (reconnect) लगीं — यही प्रक्रिया कहलाती है magnetic reconnection।

यह पुनर्संयोजन इतनी व्यापक थी कि इसका क्षेत्र अनुमानतः 13 लाख किलोमीटर (≈1.3×10^6 km) चौड़ा था — यानी पृथ्वी के आकार का लगभग 100 गुना।

3) magnetic reconnection क्यों खतरनाक है?

जब चुंबकीय क्षेत्र-रेखाएँ अचानक टूटती और फिर से जुड़ती हैं, तो बड़ी मात्रा में चुंबकीय ऊर्जा कणों में बदल जाती है। परिणामस्वरूप कणों की ऊर्जा तेज़ी से बढ़ती है — इससे सौर तूफान की तीव्रता बढ़ जाती है और पृथ्वी पर प्रभाव ज्यादा कड़वा होता है (उच्च ऊर्जा कण उपग्रहों को डैमेज कर सकते हैं, रेडिएशन बढ़ सकता है, गैजेट्स के सर्किट प्रभावित हो सकते हैं)।

Aditya-L1 की विशिष्ट भूमिका — क्या नया मिला?

सटीक चुंबकीय क्षेत्र माप (high-precision magnetic measurements): Aditya-L1 ने चुंबकीय क्षेत्रों को बहुत बारीकी से नापा — जिससे reconnection के छोटे-से-छोटे संकेत भी पकड़े गए।

बहु-बिंदु अवलोकन (multi-point observations): Aditya-L1 ने नासा के WIND सहित अन्य उपग्रहों के साथ मिलकर एक ही घटना को अलग-अलग स्थानों से मॉनिटर किया — इसने घटना के 3D चित्रण (mapping) को संभव बनाया।

reconnection zone का मानचित्रण: वैज्ञानिक इस बात में सफल रहे कि वह स्थान/क्षेत्र कहाँ था जहाँ चुंबकीय लाइनें टूट रहीं थीं और फिर जुड़ रहीं थीं — और यह क्षेत्र असाधारण रूप से विशाल निकला।

कण ऊर्जा में वृद्धि के प्रमाण: उपग्रहों ने कणों की अचानक गति/ऊर्जा वृद्धि दर्ज की — जो reconnection की पुष्टि करती है।

संक्षेपः Aditya-L1 का उच्च-गुणवत्ता-डेटा और L1 बिंदु पर उसका स्थान (Earth–Sun Lagrange Point-1) इस घटना को समझने के लिए बहुत उपयुक्त साबित हुआ।

पृथ्वी पर प्रभाव और जोखिम

Gannon Storm ने पृथ्वी के पर्यावरण और तकनीकी प्रणालियों पर तेज प्रभाव डाला:

उपग्रहों में रेडिएशन-लैवल वृद्धि → संभावित इलेक्ट्रॉनिक डैमेज और संचार में व्यवधान।

GPS सिग्नल की सटीकता पर असर → नेविगेशन, एवीएशन और लोकेशन-बेस्ड सर्विसेज प्रभावित।

उच्च आवृत्ति (HF) रेडियो संचार में ब्लर/ड्रॉप्स।

बिजली ग्रिड पर थर्मल/इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रभाव का जोखिम (बड़े तूफानों में ट्रांसफार्मर इत्यादि प्रभावित होते रहे हैं)।

व्यापक ऑरोरा (northern/southern lights) — जो उच्च-आकर्षक विजुअल घटनाएँ भी हुईं।

शोध प्रकाशित — संदर्भ और महत्व

ISRO ने बताया कि इस घटना से जुड़ा शोध पत्र Astrophysical Journal Letters जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, जहाँ reconnection-process और multi-satellite observations का वैज्ञानिक विवेचन दिया गया है। (ISRO के बयान के अनुसार) — यह अध्ययन सौर तूफानों के विकास और तीव्रता-वृद्धि के यांत्रिकी (mechanisms) को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

वैज्ञानिक और व्यावहारिक निहितार्थ (Implications)

वैज्ञानिक स्तर पर

सौर तूफानों के एवोल्यूशन (evolution) को समझने में नई अंतर्दृष्टि — विशेषकर तब जब CMEs आपस में इंटरैक्ट कर रहे हों।

भविष्य के स्पेस-वेदर मॉडल में magnetic reconnection और multi-CME interactions को बेहतर तरीके से शामिल किया जा सकेगा।

अंतरिक्ष में “विभिन्न vantage points” से डेटा की अहमियत सिद्ध हुई — इसलिए बहु-उपग्रह समन्वय और डेटा-शेयरिंग की आवश्यकता बढ़ी।

व्यावहारिक-प्रयोगिक स्तर पर

उपग्रह डिजाइन और ऑपरेशन में रेडिएशन-सतर्कता (hardening) को बढ़ाना आवश्यक।

पावर-ग्रिड और संचार इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बेहतर पूर्वानुमान (lead time) और जोखिम-नियोजन (mitigation) आवश्यक।

वैश्विक स्तर पर स्पेस-वेदर चेतावनी प्रणालियों में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट हुई।

Aditya-L1: मिशन की तकनीकी मुख्य बातें (सारांश)

लॉन्च: सितम्बर 2023

पोजिशन: Lagrange Point-1 (Earth–Sun L1) — सूर्य-नियंत्रित निगरानी के लिए आदर्श बिंदु।

मुख्य उपकरण: सोलर इमेजर्स, स्पेक्ट्रोमीटर, और हाई-सेंसेटिव मैग्नेटोमीटर (Magnetometer) — जो चुंबकीय क्षेत्र की उच्च निष्ठा वाली माप देते हैं।

उद्देश्य: सूर्य के वातावरण, CME, सोलर विंड और स्पेस-वेदर का अध्ययन करना; पृथ्वी और अंतरिक्ष प्रणालियों पर सौर प्रभावों का भविष्यवाणी मॉडल बनाना।

Pradeep Dabas

Writer & Blogger

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