फाइलों के खेल ने छीनी 16 जिंदगियां, क्या यह नरसंहार है

The game of files took away 16 lives
The game of files took away 16 lives

The game of files took away 16 lives. कब तक फाइलों में दबी रहेंगी जिंदगियां ? कब तक किसी अफसर की टेबल पर पड़े एक हस्ताक्षर के इंतजार में मासूम लोग मरते रहेंगे? कब तक मौतों को “सिस्टम की गलती” कहकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल — ये 16 मौतें… क्या सिर्फ लापरवाही हैं या ये असली मतलब में प्रशासनिक नरसंहार है?

भागीरथपुरा: जहां नल से पानी नहीं, मौत निकली

इंदौर का भागीरथपुरा — जहां पानी नहीं, जहर बहा। जहां नल खोला तो जिंदगी नहीं, मौत निकली और ये सब अचानक नहीं हुआ ये मौतें तीन साल से तैयार की जा रही थीं… सरकारी टेबलों पर, अफसरों के केबिन में, और नेताओं के फैसलों के बीच । पाइपलाइन बदलने का निर्णय हुआ था — टेंडर बने, बैठकें हुईं, फाइलें चलीं… लेकिन काम नहीं हुआ । क्योंकि इस देश में फाइलें दौड़ती नहीं, रेंगती हैं। और जब तक इंसानी लाशें खबर न बन जाएं, तब तक ये सिस्टम नहीं जागता!

फाइलों की सुस्ती और इंसानी जान की कीमत

सोचिए — जुलाई 2022 में टेंडर जारी हुआ । नवंबर तक फाइल सब मंजूर। फिर रुक गई । तीन महीने तक एक केबिन में धूल खाती रही । फरवरी में जाकर साइन हुए । यानी जब लोग बीमार पड़ रहे थे, तब अफसर फाइल पर स्याही की जगह “वक़्त” सुखा रहे थे। और जब पहला फेज़ अधूरा रह गया, तब भी ना किसी ने जवाब मांगा, ना किसी ने गति दी। डेढ़ साल तक गंदा पानी भागीरथपुरा की नसों में दौड़ता रहा — और सिस्टम मौन बैठा रहा।

दूसरा फेज़: मौतों से पहले भी नहीं जागा सिस्टम

दूसरे फेज का सच तो और ज़्यादा भयावह है। नवंबर 2024 में फाइल बनकर तैयार, अगस्त 2025 में टेंडर जारी, लेकिन सितंबर में जब टेंडर खुलना था — फाइल वहीं की वहीं रह गई, अपर आयुक्त की मेज पर। आठ महीने तक कुछ नहीं हुआ। और फिर दिसंबर आया — जब अस्पतालों में लाइनें लगीं, जब एक के बाद एक जानें जाती रहीं, तब वही फाइल जो महीनों नहीं चली… 24 घंटे में मंज़ूर हो गई। बताइए — क्या सरकार के लिए स्याही इंसानी खून से ज्यादा कीमती हो गई है? सच यही है — इस देश के सिस्टम में कार्रवाई तब होती है जब मौतें गिनी जाने लगती हैं, जब खबरें वायरल होती हैं ।

शिकायतें थीं, मगर कुर्सियां नहीं हिलीं

भागीरथपुरा के लोगों ने सालों शिकायतें दीं — “गंदा पानी आ रहा है”, “बदबू है”, “बच्चे बीमार हैं” — लेकिन अफसरों की कुर्सियाँ नहीं हिलीं। उनकी फाइलें बंद दराज़ों में सोती रहीं… और जनता मौत से लड़ती रही। सरकार अब कहती है — कार्रवाई हो गई है। कमिश्नर को हटा दिया, दो अफसर सस्पेंड कर दिए। लेकिन सवाल है — मौतें किसकी वजह से हुईं? क्या सिर्फ उन तीन अफसरों से? क्या उन नेताओं से नहीं जिन्होंने हर मीटिंग में इन फाइलों पर साइन किए या रोक लगाए?

मौत के बाद की कार्रवाई और सिस्टम की बीमारी

जब फैसले की ज़रूरत थी, तब सब चुप थे। अब जब मौतें हो गईं, तब “कार्रवाई की जा रही है” जैसे बयान दिए जा रहे हैं। यही इस सिस्टम की असली बीमारी है — प्रतिक्रिया हमेशा मौत के बाद होती है।

सरकार का दावा बनाम जनता का सच

अब सुनिए सिस्टम की सफाई ! सरकार हाईकोर्ट में कहती है—“सिर्फ चार मौतें हुई हैं।” क्या जनता झूठ बोल रही है? क्या 16 घरों का मातम फर्जी है? क्या अस्पताल की रिपोर्टें बस फेसबुक पोस्ट हैं? क्या सरकार का “सत्य” सिर्फ उसकी अपनी रिपोर्टों में लिखा जाता है?

पानी नहीं, मौत बह रही थी

असल बात ये है ये सिस्टम सच से बचने के लिए आंकड़ों का सहारा लेता है । सच्चाई तो ये है—मेडिकल रिपोर्ट साफ़ कहती है कि नल में जो पानी था, वो ज़हर था । उसमें ई-कोलाई, फीकल कॉलिफॉर्म और विब्रियो कोलेरी जैसे बैक्टीरिया मिले। यानी वो पानी नहीं, मौत थी। पर निगम ने सब कुछ छिपाया, रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की। क्यों?

कुर्सी बनाम नागरिक की जान

क्योंकि जब सच बाहर आता है, तो कुर्सियां हिलती हैं… और इस देश में कुर्सी, नागरिकों की जान से ज़्यादा प्यारी है। सोचिए अगर किसी प्राइवेट कंपनी की लापरवाही से 16 लोग मर जाते, तो क्या होता? सीईओ जेल में होता, कंपनी की लाइसेंस रद्द होती, मीडिया उसका पीछा नहीं छोड़ता। लेकिन जब सरकारी सिस्टम ऐसा करता है — तो “निलंबन” और “ट्रांसफर” ही सजा कहलाती है!

भरोसे की मौत

क्या यही न्याय है? क्या यही सिस्टम है जिस पर हम टैक्स देते हैं, भरोसा करते हैं, वोट डालते हैं? आज भागीरथपुरा के लोग नर्मदा का पानी नहीं पी रहे। डर गए हैं। उनका भरोसा खत्म हो गया। टैंकर, बोरिंग, आरओ – यही उनका नया जलस्रोत है।

जीवन रेखा से मौत की रेखा तक

क्योंकि अब उन्हें सरकारी नल पर भरोसा नहीं। सोचिए… ये वही नर्मदा है, जो “जीवन रेखा” कही जाती है, और अब लोगों के लिए “मौत की रेखा” बन गई है। सरकार कह रही है पानी अब साफ है। लेकिन लोगों के दिल में गंदगी नहीं गई है — जो भरोसे को खा गई।

सवाल जो गलियों में गूंज रहे हैं

भागीरथपुरा की गलियों में आज सिर्फ मातम नहीं है, गुस्सा भी है। वहां की औरतें आज पानी नहीं भर रहीं — बल्कि सवाल पूछ रही हैं। “क्यों हमारे बच्चे मरे?” “क्यों तीन साल तक पाइपलाइन नहीं बदली?”

मुआवज़ा नहीं, मजबूरी

क्या कोई जवाब है ? नहीं । सिर्फ एक ठंडी फाइल है, जिस पर अब भी साइन की स्याही सूख रही है। अब सरकार मुआवज़ा देगी — चार लाख रुपए। क्या एक मां का बच्चा वापस आ जाएगा? क्या एक बाप का दर्द घट जाएगा? नहीं।

हर हादसे के बाद वही झूठा वादा

ये मुआवज़ा नहीं, मजबूरी है। ताकि लोग चुप रहें, ताकि फाइल बंद हो जाए। मगर ये आवाज़ अब बंद नहीं होनी चाहिए। हर हादसे के बाद यही कहा जाता है — “ऐसा फिर नहीं होगा।” लेकिन हर बार, यही होता है।

सिस्टम का असली चेहरा

हर शहर में, हर विभाग में। फर्क इतना है कि नाम बदल जाते हैं, तारीखें बदल जाती हैं, लेकिन सिस्टम वैसा ही रहता है — बेपरवाह, सुस्त, और बेशर्म।

ये हादसा नहीं, सिस्टम की हत्या है

आज जरुरत है कि इस पूरे सिस्टम से पूछा जाए — जवाब चाहिए! ये सिर्फ अफसरों की नहीं, पूरे प्रशासन की असफलता है। नेता, नौकरशाह, तकनीकी सिस्टम — सब इस हत्या के हिस्सेदार हैं।

आख़िरी सवाल — फैसला आपका

अगर जवाबदेही तय नहीं हुई, तो कल यही जहर किसी और के नल से निकलेगा । क्योंकि ये सिस्टम इंसान नहीं देखता, सिर्फ फाइलें देखता है । इंदौर की इन 16 मौतों ने बता दिया कि इस देश में इंसान की कीमत अब स्याही की एक बूंद से भी कम हो गई है।
अब सवाल आपसे — क्या इन मौतों को “दुर्भाग्य” कहकर छोड़ देना चाहिए, या “सिस्टम के नरसंहार” का नाम देना चाहिए?

Pradeep Dabas

Writer & Blogger

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