रोहतक के डीएलसीसुपवा में वर्ल्ड थिएटर डे, AI बनाम रंगमंच पर चर्चा”

रोहतक के डीएलसीसुपवा में वर्ल्ड थिएटर डे, AI बनाम रंगमंच पर चर्चा”
रोहतक के डीएलसीसुपवा में वर्ल्ड थिएटर डे, AI बनाम रंगमंच पर चर्चा”

वर्ल्ड थिएटर डे के अवसर पर दादा लख्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स (डीएलसीसुपवा) में आयोजित नाट्य संवाद एवं परिचर्चा में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक प्रो वामन माधवराव केंद्रे ने स्पष्ट कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कभी भी थिएटर की जगह नहीं ले सकता।

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उन्होंने कहा कि रंगमंच पर कलाकारों की जीवंत प्रस्तुति से जो भावनाएं, संवेदनाएं और ऊर्जा उत्पन्न होती हैं, वह किसी भी डिजिटल माध्यम या तकनीक से संभव नहीं है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि आधुनिक तकनीक, टीवी और सिनेमा के विकास के बावजूद थिएटर की अपनी अलग पहचान आज भी कायम है।

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प्रो वामन माधवराव केंद्रे ने कहा कि थिएटर हमेशा से जुनूनी कलाकारों के समर्पण से जीवित रहा है और आगे भी रहेगा । उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि परफॉर्मिंग आर्ट्स जैसे क्षेत्रों में वही लोग सफल होते हैं, जो कुछ अलग करने का साहस रखते हैं ।
इस अवसर पर प्रसिद्ध नाटककार डॉ प्रताप सहगल ने कहा कि नाटक व्यक्ति को संवेदनशील बनाता है और उसकी सोच का दायरा बढ़ाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि एआई का अत्यधिक उपयोग थिएटर की मौलिकता को प्रभावित कर सकता है।
वहीं, रंगकर्मी डॉ मृत्युंजय प्रभाकर ने कहा कि तकनीक का संतुलित उपयोग जरूरी है, लेकिन उस पर पूरी तरह निर्भर होना रंगमंच की मूल भावना के खिलाफ है।

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कार्यक्रम में कुलगुरु डॉ अमित आर्य ने बताया कि विश्वविद्यालय रंगमंच को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। उन्होंने ‘भारत रंग महोत्सव’ के हरियाणा चैप्टर और ‘सारंग’ जैसे आयोजनों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन पहलों से प्रदेश में थिएटर संस्कृति को मजबूती मिल रही है।

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कार्यक्रम की शुरुआत छात्रों के सामूहिक शंखनाद से हुई।
इसके बाद कविता पाठ, रंग-संगीत और प्रदर्शनी के माध्यम से छात्रों ने अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन किया, जिसे अतिथियों ने सराहा।
अपने संबोधन में प्रो वामन माधवराव केंद्रे ने कहा कि कई बार बड़े मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए नए विवाद खड़े किए जाते हैं। उन्होंने वैश्विक परिदृश्य में चल रही घटनाओं पर भी सवाल उठाए।

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डिजिटल युग में तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बावजूद इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि थिएटर की आत्मा आज भी जीवंत है और इसे आगे बढ़ाने में युवाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है

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