
India’s goal is to teach dignity through conduct: Bhagwat, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत आज राजस्थान के डीडवाना स्थित छोटी खाटू पहुंचे। यहां उन्होंने जैन समाज द्वारा आचार्य महाश्रमण के सानिध्य में आयोजित 162वें मर्यादा महोत्सव में भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान संतों की वाणी सुनने के बाद मोहन भागवत ने भारत की भूमिका और जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया।
भारत का वास्तविक कार्य – मर्यादा का पाठ पढ़ाना
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि भारत का वास्तविक कार्य पूरी दुनिया को मर्यादा का पाठ पढ़ाना है। यह कार्य केवल पुस्तकों या भाषणों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए अपने आचरण को उदाहरण बनाना होगा। उन्होंने कहा कि ज्ञान किताबों में सुरक्षित रहता है और भाषण सभी सुनते हैं, लेकिन जब तक उसे व्यवहार में नहीं उतारा जाता, तब तक उसका कोई अर्थ नहीं होता।
शाश्वत सत्य और समय के अनुसार आचरण
संघ प्रमुख ने कहा कि हजारों साल पहले बताए गए सत्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। फर्क केवल इतना है कि उन्हें अपनाने की पद्धति समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। उन्होंने कहा कि आज की परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए हमें अपने शाश्वत मूल्यों को वर्तमान समाज के अनुसार व्यवहार में लाना होगा।
उन्होंने संघ के लाठी अभ्यास का उदाहरण देते हुए कहा कि शक्ति साधना क्यों की जा रही है, यह याद रखने के लिए ही वे संतों के सानिध्य में आते हैं, ताकि शक्ति का उपयोग धर्म और मर्यादा के लिए हो।
भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता का महत्व
मोहन भागवत ने कहा कि भारतीय समाज कभी केवल धन के पीछे नहीं भागा। भारत की संस्कृति में हमेशा से आध्यात्मिकता और संतों का विशेष स्थान रहा है। आज भले ही आचरण में गिरावट की बात की जाती हो, लेकिन इसके बावजूद दान, परोपकार और सेवा की भावना आज भी भारतीय समाज की पहचान बनी हुई है।
एकात्मता का भाव – वसुधैव कुटुंबकम्
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया सत्य की खोज में निकली थी, लेकिन भारत के पूर्वजों ने उस सत्य को खोज कर जाना कि बाहरी रूप से भिन्न दिखने के बावजूद हम सब मूल रूप से एक हैं। जब यह भावना मन में आती है, तो कोई भी पराया नहीं रहता और पूरी मानवता एक परिवार लगती है।
संकट में दुनिया की मदद करना भारत का धर्म
मोहन भागवत ने कहा कि भारत ने हमेशा संकट के समय दुनिया की मदद की है। पाकिस्तान में बाढ़ हो, नेपाल में आपदा, मालदीव या श्रीलंका की सहायता – भारत ने हर जगह मानवता के नाते मदद की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह कोई राजनीति नहीं, बल्कि भारत का धर्म है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का लक्ष्य दुनिया को जीतना नहीं है, बल्कि अपने आचरण से दिशा दिखाना और दुनिया को संस्कारित करना है। यह भारत का ईश्वर-प्रदत्त और नियति-प्रदत्त कर्तव्य है। अब समय आ गया है कि भारत इस भूमिका के लिए पूरी तरह तैयार हो।









