दहशत के साये में सिंहभूम के लोग, हाथी की दहशत से घरों में कैद

dahashat ke saaye mein sinhabhoom ke log,
dahashat ke saaye mein sinhabhoom ke log, यह तस्वीर सांकेतिक रूप से लगाई गई है ।

झारखंड की राजधानी से करीब 200 किलोमीटर दूर पश्चिम सिंहभूम के कुछ गांव इन दिनों दहशत के साए में जी रहे हैं। जैसे ही सूरज ढलता है, पूरा इलाका सन्नाटे में डूब जाता है। लोग अपने-अपने घरों में कैद हो जाते हैं। रात में अगर कहीं कुत्ता भी भौंक दे, तो दिल दहल उठता है। गांव के कच्चे-पक्के घरों में रहने वाले लोगों के चेहरों पर डर साफ नजर आता है

यह डर किसी इंसान से नहीं, बल्कि एक जंगली हाथी से है—जो अब लोगों के लिए मौत का दूसरा नाम बन चुका है। यह हाथी सिर्फ खेतों और घरों को नुकसान नहीं पहुंचा रहा, बल्कि अब तक 20 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है।

20 से ज्यादा मौतें, गांवों में कोहराम

1 जनवरी 2026 से शुरू हुआ यह खौफनाक सिलसिला चाईबासा और कोल्हान के कई गांवों तक फैल चुका है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कई गांवों से लोग घर छोड़कर पलायन कर गए हैं। वन विभाग की बार-बार कोशिशों के बावजूद यह हाथी पकड़ से बाहर है और हर दिन ज्यादा खतरनाक होता जा रहा है।

इस हाथी को काबू में करने के लिए तीन राज्यों के वन विभाग मिलकर ऑपरेशन चला रहे हैं। 100 से ज्यादा वनकर्मी और अधिकारी लगातार इसकी तलाश में जुटे हैं, लेकिन सफलता अब तक नहीं मिल पाई है।

क्यों बना इतना खतरनाक यह हाथी

वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक यह हाथी अपने झुंड से बिछड़ गया है। झुंड से अलग होने के कारण वह तनाव में आ गया और आक्रामक हो गया। इसके अलावा बताया जा रहा है कि हाथी इस समय ‘मस्त’ अवस्था यानी हीट पर है। इस दौरान उसके शरीर में हार्मोन का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, जिससे वह बेहद उत्तेजित और हिंसक हो जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार इस स्थिति से बाहर आने में हाथी को 15 से 20 दिन लग सकते हैं।

रात के अंधेरे में करता है हमला

इस हाथी की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह रात में ही हमला करता है। कई बार उसे ट्रैंक्युलाइज करने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार वह भागने में कामयाब रहा। वन्यजीव विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है और गांवों के सरपंचों व ग्रामीणों को अलर्ट पर रखा गया है, ताकि हाथी की किसी भी मूवमेंट की सूचना तुरंत मिल सके।

रोजाना 30 किलोमीटर का सफर

हाथी की लोकेशन ट्रैक करना इसलिए भी मुश्किल हो रहा है क्योंकि वह रोज करीब 30 किलोमीटर तक सफर कर रहा है। पश्चिम सिंहभूम से शुरू हुआ इसका आतंक अब एक जगह टिकने का नाम नहीं ले रहा, जिससे खतरा और बढ़ गया है।

जंगल जाना बंद, घरों में कैद जिंदगी

हाथी के डर से लोग जंगल जाना छोड़ चुके हैं। बच्चों को बाहर खेलने नहीं दिया जा रहा। शाम होते ही पूरे गांव में सन्नाटा छा जाता है। सुरक्षा के लिए पेड़ों पर मचान बनाए गए हैं। लोग मजबूरी में हथियार लेकर बाहर निकल रहे हैं और हाथी को भगाने के लिए पटाखों का सहारा लिया जा रहा है।

इंसान-हाथी संघर्ष बढ़ने की वजह

झारखंड में इंसान और हाथियों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। बीते 18 सालों में यहां 1270 लोगों की मौत हाथियों के हमले में हो चुकी है, जबकि 150 हाथियों की भी जान गई है। राज्य में करीब 600 हाथी मौजूद हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि जंगलों का सिमटना और हाथी कॉरिडोर का खत्म होना इसकी सबसे बड़ी वजह है। झारखंड में करीब 10 फीसदी सुरक्षित हाथी कॉरिडोर खत्म हो चुके हैं।

क्या मारा जाएगा यह हाथी?

इस बीच हैदराबाद के मशहूर शिकारी और पूर्व नेशनल शूटिंग चैंपियन नवाब शफत अली खान ने हाथी को पकड़ने में मदद की पेशकश की है। हालांकि वन विभाग की तरफ से इस पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस हाथी का अंजाम क्या होगा?

वन विभाग के पास तीन विकल्प होते हैं—

हाथी को दूसरी जगह शिफ्ट करना, जो मौजूदा हालात में मुश्किल लग रहा है।

उसे ट्रैंक्युलाइज करना, जिसकी कोशिशें अब तक नाकाम रही हैं।

और आखिरी विकल्प—हाथी को गोली मार देना।

अब देखना यह है कि वन विभाग कौन सा रास्ता चुनता है और कब तक गांव वालों को इस खौफ से राहत मिलती है।

HIndustan Uday News

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