
देश की शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है — क्या कुछ निजी स्कूल RTE (शिक्षा का अधिकार कानून) के तहत मिलने वाले अनिवार्य 25% गरीब बच्चों के दाखिले से बचने के लिए “अल्पसंख्यक संस्थान” का दर्जा हासिल कर रहे हैं?
हाल ही में महाराष्ट्र में सामने आए आरोपों के बाद सरकार ने इस पूरे मामले पर औपचारिक जांच शुरू कर दी है, जिसमें यह पता लगाया जाएगा कि कहीं स्कूलों द्वारा अल्पसंख्यक दर्जा सिर्फ सरकारी नियमों से बचने और अनुदान (Grants) का फायदा उठाने के लिए तो नहीं लिया जा रहा।
क्या है पूरा मामला?
राज्य के स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री Pankaj Bhoyar ने गुरुवार को कहा कि कुछ स्कूलों द्वारा अल्पसंख्यक दर्जे का दुरुपयोग किए जाने की शिकायतें मिली हैं। आरोप है कि:
- कई स्कूलों ने RTE कानून के तहत 25% सीट आरक्षित करने से बचने के लिए अल्पसंख्यक टैग लिया
- इस दर्जे के जरिए सरकारी लाभ और ग्रांट्स हासिल किए जा रहे हैं
- कुछ मामलों में एक ही दिन में दर्जनों स्कूलों को मंजूरी दी गई
रिपोर्ट्स के मुताबिक, महाराष्ट्र में करीब 8,000 स्कूलों को अल्पसंख्यक दर्जा दिया जा चुका है, जिससे वे RTE की अनिवार्य सीट आरक्षण नीति से बाहर हो जाते हैं।
RTE कानून में क्या है छूट?
RTE (Right to Education) कानून के तहत:
- सभी गैर-अल्पसंख्यक निजी स्कूलों को 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं
लेकिन…
- अल्पसंख्यक संस्थानों को इस नियम से छूट मिलती है
यही छूट अब विवाद का कारण बन गई है, क्योंकि आरोप है कि कुछ संस्थान इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल नियमों से बचने के लिए कर रहे हैं।
जांच में क्या देखा जाएगा?
सरकार द्वारा शुरू की गई इस जांच में मुख्य रूप से:
- अल्पसंख्यक दर्जा देने की प्रक्रिया
- RTE नियमों के अनुपालन की स्थिति
- सरकारी अनुदानों का उपयोग
- फर्जी दस्तावेजों के जरिए दाखिले
इन सभी बिंदुओं की गहन समीक्षा की जाएगी। अगर किसी भी संस्थान को अनुचित तरीके से दर्जा लेने या उसका गलत लाभ उठाने का दोषी पाया गया, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी, चाहे संस्थान कितना भी बड़ा क्यों न हो।
सरकार का क्या कहना है?
मंत्री ने साफ कहा कि RTE का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है। अगर कोई संस्थान इस नीति की मूल भावना को कमजोर करता है, तो उसके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।










