
6.8 million names will be removed from West Bengal’s voter list , भारतीय चुनाव आयोग की विशेष गहन जांच (SIR) के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से करीब 68 लाख नाम हटाने की तैयारी है। यह कुल मतदाताओं का लगभग 9% माना जा रहा है—जो राज्य के चुनावी इतिहास में एक बड़ा बदलाव है। आयोग 28 फरवरी को अंतिम सूची जारी करने जा रहा है, लेकिन इससे पहले सियासत तेज हो गई है।
कितने नाम हटे, कितने और हटेंगे?
16 दिसंबर को जारी मसौदा सूची में लगभग 7.1 करोड़ मतदाता दर्ज थे। इसमें से पहले ही 58 लाख से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं । जो नाम मतदाता सूचियों से हटाए हैं उसके बारे में चुनाव आयोग का कहना है कि कुछ लोग जो मर चुके हैं उनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं दूसरे जो लोग बंगाल को छोड़कर किसी दूसरी जगह जा चुके हैं । तीसरे जो लंबे समय से गैरहाजिर रहे है । कुछ ऐसे मतदाता है जिनके नाम काटे गए हैं उनमें दो दो जगह मतदाता पहचान पत्र बनवा लिए थे । सूत्रों के मुताबिक करीब 10 लाख और नाम अंतिम सूची से हट सकते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर कटौती 68 लाख से अधिक हो सकती है।
1.5 करोड़ रिकॉर्ड्स में गड़बड़ी कैसे मिली ?
आयोग के अधिकारियों के अनुसार
- लगभग 1.5 करोड़ रिकॉर्ड्स में डेटा मिसमैच या अधूरी जानकारी मिली।
- इन सभी को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाया गया।
- 3.6 लाख मतदाताओं को नोटिस नहीं मिल पाया, क्योंकि बूथ स्तर के अधिकारी उन्हें खोज नहीं सके—इन नामों को सीधे हटाया जा सकता है।
- 5.2 लाख लोग सुनवाई में पेश नहीं हुए।
- दस्तावेज़ जांच में 1.6 लाख नाम अयोग्य पाए गए।
इस तरह कम से कम 10.4 लाख नाम और हटने की संभावना है।
फर्जी दस्तावेजों पर सख्ती
जांच में ऐसे मामले भी सामने आए जहां—
- अखबार की कतरन
- खाली पन्ने
- धुंधली या अधूरी तस्वीरें
को पहचान पत्र के रूप में अपलोड किया गया था। इन मामलों की दोबारा जांच जिला अधिकारियों और पर्यवेक्षकों के स्तर पर की जा रही है।
नए आवेदन और सुधार
- 7.4 लाख नए मतदाता आवेदन
- 42 हजार से ज्यादा नाम हटाने के आवेदन
- 3.4 लाख सुधार आवेदन
इन सभी का निपटारा अंतिम सूची जारी होने से पहले किया जाएगा।
ममता बनर्जी का विरोध: “लोकतंत्र से खिलवाड़”
इस कार्रवाई पर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
ममता बनर्जी के मुख्य आरोप
- बड़ी संख्या में नाम हटाना लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला है।
- गरीब, प्रवासी मजदूर और अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाता अनुपात से अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
- बूथ स्तर पर नोटिस न मिलना प्रशासनिक विफलता है, इसका खामियाजा मतदाताओं को क्यों?
- अंतिम सूची से पहले व्यापक पुनःसत्यापन (re-verification) की मांग।
टीएमसी का कहना है कि अगर किसी का नाम गलत तरीके से हटाया गया, तो वह कानूनी लड़ाई लड़ेगी और ज़रूरत पड़ी तो बड़े पैमाने पर जनआंदोलन भी करेगी।
चुनाव आयोग का पक्ष
आयोग का कहना है कि—
- यह पूरी प्रक्रिया कानूनी और पारदर्शी है।
- हर प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिया गया।
- उद्देश्य केवल फर्जी, डुप्लीकेट और अपात्र नाम हटाना है ताकि चुनाव निष्पक्ष हों।
आगे क्या?
28 फरवरी को जब अंतिम सूची आएगी, तब साफ होगा—
- कितने नाम वाकई हटे
- कितने लोगों ने दोबारा पंजीकरण कराया
- और इसका आगामी चुनावों पर क्या असर पड़ेगा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने से चुनावी गणित और रणनीतियां बदल सकती हैं।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में यह अब तक की सबसे बड़ी ‘सफाई’ बताई जा रही है। लेकिन जहां एक तरफ आयोग इसे पारदर्शिता का कदम बता रहा है, वहीं ममता बनर्जी इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रहार मान रही हैं।








