
Bharat Bandh in protest against four new labour laws, देशभर में आज ट्रेड यूनियनों द्वारा बुलाए गए भारत बंद का मिला-जुला असर देखने को मिल रहा है। पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में जहां बंद का व्यापक प्रभाव दिख रहा है, वहीं दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में जनजीवन सामान्य बना हुआ है। हालांकि कुछ स्थानों पर सार्वजनिक परिवहन, बैंकिंग सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों पर आंशिक असर देखने को मिला है।
यह भारत बंद 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में बुलाया गया है। यूनियनों का दावा है कि करीब 30 करोड़ श्रमिक इस हड़ताल में शामिल हो सकते हैं, जिससे परिवहन समेत कई क्षेत्रों के कामकाज पर असर पड़ने की संभावना है।
क्यों बुलाया गया भारत बंद?
भारत बंद का मुख्य कारण साल 2025 में लागू चार नए श्रम कानूनों का विरोध है। ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि ये कानून श्रमिकों के अधिकारों को कमजोर करते हैं और कंपनियों को कर्मचारियों को आसानी से निकालने की छूट देते हैं। इसके अलावा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर भी यूनियनों ने चिंता जताई है।
हड़ताल के अन्य प्रमुख कारणों में सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण का विरोध, सरकारी नौकरियों में कटौती, वेतन वृद्धि की कमी, सामाजिक सुरक्षा की मांग और मनरेगा जैसी रोजगार योजनाओं को मजबूत करने की मांग शामिल है। प्रदर्शनकारी बिजली संशोधन विधेयक, ड्राफ्ट सीड बिल और अन्य प्रस्तावित कानूनों को भी श्रमिक और किसान विरोधी बताते हुए वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
किन संगठनों ने किया भारत बंद का आह्वान
भारत बंद का आह्वान 10 प्रमुख ट्रेड यूनियनों — INTUC, AITUC, HMS, CITU, AIUTUC, TUCC, SEWA, AICCTU, LPF और UTUC — के संयुक्त मंच ने किया है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने भी इस बंद का समर्थन किया है। इसके अलावा कई किसान संगठन, कृषि मजदूर संगठन, छात्र और युवा संगठन भी हड़ताल में शामिल हुए हैं।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें
प्रदर्शनकारियों ने सरकार के सामने कई मांगें रखी हैं। इनमें चारों श्रम संहिताओं को वापस लेना, श्रमिकों और किसानों के अधिकारों के खिलाफ माने जा रहे विधेयकों को रद्द करना, ग्रामीण रोजगार योजनाओं को मजबूत करना और कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी शामिल है।
किन सेवाओं पर पड़ा असर
भारत बंद के चलते कुछ क्षेत्रों में बैंकिंग, बीमा, परिवहन, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं पर आंशिक असर पड़ सकता है। कई जगहों पर औद्योगिक इकाइयों, मैन्युफैक्चरिंग हब और सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यालयों का काम प्रभावित हुआ है। वहीं, विरोध वाले क्षेत्रों में ग्रामीण रोजगार योजनाओं के तहत काम भी प्रभावित होने की खबर है। हालांकि व्यापारिक संगठनों ने बंद से दूरी बनाई है। प्रमुख व्यापारी संगठनों ने स्पष्ट किया है कि देशभर में बाजार खुले रहेंगे और व्यापार सामान्य रूप से जारी रहेगा।
कहां दिखा भारत बंद का ज्यादा असर
भारत बंद का सबसे ज्यादा असर पश्चिम बंगाल और ओडिशा में देखने को मिला है। ओडिशा के बालासोर में एक शॉपिंग मॉल खुला रहने को लेकर तनाव की स्थिति बन गई, जहां प्रदर्शनकारियों और स्थानीय लोगों के बीच झड़प की खबर सामने आई। बेंगलुरु में ऑटो और टैक्सी चालकों ने बंद का समर्थन किया और विरोध प्रदर्शन किए। केरल में भी जनजीवन प्रभावित होने की खबर है, जहां सरकारी कार्यालयों में उपस्थिति कम रहने और परिवहन सेवाओं पर असर की आशंका जताई गई है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और बिहार के कई हिस्सों में बंद का खास असर नहीं दिखा और सामान्य गतिविधियां जारी रहीं।
राजनीतिक दलों का मिला समर्थन
भारत बंद को कई राजनीतिक दलों का समर्थन मिला है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने हड़ताल का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने मजदूरों और किसानों के मुद्दों का समर्थन किया है। वहीं कुछ संगठनों ने इस हड़ताल से दूरी भी बनाई है। नेशनल फ्रंट ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (NFITU) ने इसे राजनीतिक बताते हुए भाग लेने से इनकार किया और कहा कि श्रम सुधार मजदूरों के हित में हैं।
स्कूल, बैंक और सरकारी सेवाओं की स्थिति
दिल्ली में बैंकों को लेकर कोई आधिकारिक बंद की घोषणा नहीं हुई है, हालांकि ग्राहकों को अपने बैंक से जानकारी लेने की सलाह दी गई है। कर्नाटक सरकार ने राज्य के सभी स्कूल सामान्य रूप से संचालित करने का आदेश दिया है। वहीं केरल सरकार ने अपने कर्मचारियों को हड़ताल में शामिल न होने की चेतावनी देते हुए “नो वर्क, नो पे” नियम लागू करने की बात कही है।
निष्कर्ष
देशभर में भारत बंद का असर अलग-अलग राज्यों में अलग स्तर पर देखने को मिल रहा है। जहां कुछ राज्यों में प्रदर्शन तेज हैं, वहीं कई जगह जनजीवन सामान्य बना हुआ है। ट्रेड यूनियन और किसान संगठन सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध दर्ज कर रहे हैं, जबकि सरकार समर्थक संगठन श्रम सुधारों को जरूरी बता रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और ट्रेड यूनियनों के बीच इस मुद्दे पर क्या समाधान निकलता है और श्रम सुधारों को लेकर देश में बहस किस दिशा में आगे बढ़ती है।









