
Nepal को सदियों से देवभूमि और तपोभूमि के रूप में जाना जाता है। हिमालय की गोद में बसा यह देश केवल प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि अपनी गहरी आध्यात्मिक चेतना के लिए भी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसी Nepal की राजधानी काठमांडू में स्थित Pashupatinath Temple हिंदू धर्म का एक ऐसा सर्वोच्च तीर्थ है, जहाँ भगवान शिव अपने पशुपति स्वरूप में विराजमान हैं। कहा जाता है कि अगर कोई व्यक्ति पशुपतिनाथ मंदिर के दक्षिणी द्ववार का दर्शन करे
Pashupatinath Temple केवल पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि यह जीवन, मृत्यु, कर्म और मोक्ष का जीवंत दर्शन कराता है। यह वही स्थान है जहाँ एक ओर वेद मंत्रों के साथ भगवान शिव की आराधना होती है, तो दूसरी ओर बागमती नदी के तट पर चिताएँ जलती रहती हैं। यही द्वैत इस मंदिर को अत्यंत विशिष्ट बनाता है।
पशुपतिनाथ नाम का गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
“पशुपतिनाथ” शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है — पशु और पति। यहाँ पशु का अर्थ केवल जानवर नहीं, बल्कि समस्त जीवधारी, मनुष्य, देव, दानव और प्रकृति के सभी प्राणी हैं। पति का अर्थ है स्वामी या संरक्षक।
इस प्रकार भगवान शिव को यहाँ संपूर्ण सृष्टि का स्वामी माना गया है। Pashupatinath Temple में शिव को करुणामय रक्षक, न्यायकारी नियंत्रक और मोक्षदाता — तीनों रूपों में पूजा जाता है। यही कारण है कि यह मंदिर केवल धार्मिक नहीं, बल्कि दार्शनिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पौराणिक उत्पत्ति की कथा (शिव पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार)
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, एक समय भगवान शिव सांसारिक बंधनों से दूर होकर कैलाश पर्वत छोड़कर Nepal के घने वनों में निवास करने लगे। वे किसी भी पहचान और बंधन से मुक्त रहना चाहते थे, इसलिए उन्होंने हिरण का रूप धारण कर लिया।
जब देवताओं को ज्ञात हुआ कि शिव Nepal में हैं, तो वे उन्हें पुनः कैलाश ले जाने पहुँचे। देवताओं और हिरण रूपी शिव के बीच संघर्ष हुआ। इसी संघर्ष में भगवान शिव का एक सींग टूटकर पृथ्वी पर गिर गया, और शिव अंतर्ध्यान हो गए।
देवताओं ने उस सींग को अत्यंत पवित्र मानते हुए उसकी पूजा प्रारंभ की। समय के साथ वही सींग दिव्य ऊर्जा से भरकर शिवलिंग के रूप में प्रकट हुआ। यही शिवलिंग आज Pashupatinath Temple में प्रतिष्ठित है।
पंचमुखी शिवलिंग का रहस्य और महत्व
Pashupatinath Temple में स्थापित शिवलिंग विश्व के सबसे दुर्लभ शिवलिंगों में से एक है। यह पंचमुखी मुखलिंग है। इसके चार मुख चारों दिशाओं की ओर स्पष्ट दिखाई देते हैं, जबकि पाँचवाँ मुख ऊपर की ओर माना जाता है, जिसे ईशान मुख कहा जाता है।
चार मुख इस प्रकार हैं —
पूर्व दिशा में तत्पुरुष,
पश्चिम में सद्योजात,
उत्तर में वामदेव,
दक्षिण में अघोर।
ये पाँचों मुख सृष्टि की रचना, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी कारण Pashupatinath Temple को भगवान शिव के पूर्ण ब्रह्मांडीय स्वरूप का केंद्र माना जाता है।
ऐतिहासिक प्रमाण और मंदिर का विकास
इतिहासकारों के अनुसार Pashupatinath Temple का अस्तित्व कम से कम 5वीं शताब्दी ईस्वी से भी पहले का है। Licchavi काल के शिलालेखों में इस मंदिर का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
इसके बाद Malla राजाओं के शासनकाल में मंदिर परिसर का व्यापक विस्तार हुआ। इस काल में अनेक उप-मंदिर, धर्मशालाएँ, घाट और साधुओं के लिए आश्रम बनाए गए। समय-समय पर आए भूकंपों और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद यह मंदिर आज भी अपनी मूल आध्यात्मिक गरिमा बनाए हुए है।
Pashupatinath Temple की वास्तुकला
Pashupatinath Temple नेपाली Pagoda शैली में निर्मित है। मंदिर की दो-स्तरीय छत तांबे की बनी है, जिस पर सोने की परत चढ़ी हुई है। गर्भगृह के चारों द्वार चांदी से निर्मित हैं और उन पर देवी-देवताओं की सूक्ष्म नक्काशी की गई है।
गर्भगृह में स्थित शिवलिंग एक ही पत्थर से निर्मित है, जो इसकी प्राचीनता और अखंडता को दर्शाता है।
बागमती नदी और मोक्ष का दर्शन
Pashupatinath Temple पवित्र Bagmati River के तट पर स्थित है। Nepal में इस नदी को वही स्थान प्राप्त है, जो भारत में गंगा को।
यहाँ प्रतिदिन हिंदू रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार होते हैं। मान्यता है कि Bagmati के तट पर दाह संस्कार करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि यह मंदिर जीवन और मृत्यु — दोनों का साक्षी माना जाता है।
Pashupatinath Temple के चारों द्वार और उनके दर्शन का आध्यात्मिक फल
पूर्व द्वार
पूर्व दिशा सूर्य और ज्ञान की दिशा मानी जाती है। इस द्वार से दर्शन करने से व्यक्ति को बुद्धि, विवेक और मानसिक स्पष्टता प्राप्त होती है। विद्यार्थी और निर्णय की स्थिति में फँसे लोग इस द्वार से दर्शन को अत्यंत शुभ मानते हैं।
पश्चिम द्वार
पश्चिम द्वार कर्मों के शमन का प्रतीक है। इस द्वार से दर्शन करने से व्यक्ति के पूर्व जन्मों और वर्तमान जीवन के पाप कर्मों का प्रभाव कम होता है और आत्मा शुद्ध होती है।
उत्तर द्वार
उत्तर द्वार को मोक्ष द्वार कहा जाता है। इस द्वार से दर्शन करने से आत्मा आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होती है। साधु-संत और योगी इस द्वार को सर्वोत्तम मानते हैं।
दक्षिण द्वार
दक्षिण दिशा यम और मृत्यु से जुड़ी मानी जाती है। इस द्वार से दर्शन करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और जीवन में स्थिरता आती है। इस द्वार के बारे में तो यहां तक कहां जाता है कि तांत्रिक क्रिया की सबसे बड़ी काट है यह द्वार। तांत्रिक क्रिया से पीड़ित व्यक्ति इस द्वार के दर्शन कर ले तो उसको लाभ मिलता है । लेकिन जो ध्यान रखने योग्य बात है वह यह है कि व्यक्ति सीधे दक्षिण द्वार ही पहुंचे और फिर दक्षिण द्वार के दर्शन करके वहीं से वापस लौट जाए । और अन्य द्वारों के दर्शन न करें तभी तांत्रिक क्रिया की काट होती है ।
साधु-संत और नागा साधुओं का केंद्र
Pashupatinath Temple सदियों से साधु-संतों, नागा बाबाओं और अघोरियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ उनका तप, साधना और जीवन-शैली इस मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा को और प्रबल बनाती है।
महाशिवरात्रि का भव्य उत्सव
Mahashivratri के अवसर पर Pashupatinath Temple में लाखों श्रद्धालु Nepal और भारत से आते हैं। पूरी रात शिव भजन, ध्यान और पूजा होती है। यह पर्व शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक माना जाता है।
Pashupatinath Temple कैसे पहुँचे (How to Reach)
हवाई मार्ग:
Tribhuvan International Airport, Kathmandu मंदिर से लगभग 4 किमी दूर है। एयरपोर्ट से टैक्सी आसानी से उपलब्ध है।
सड़क मार्ग:
भारत के कई शहरों से Kathmandu के लिए बसें चलती हैं। भारतीय नागरिकों को Nepal में प्रवेश के लिए वीज़ा की आवश्यकता नहीं होती।
रेल मार्ग:
Kathmandu के लिए सीधी ट्रेन नहीं है, लेकिन भारत-नेपाल सीमा तक ट्रेन और वहाँ से सड़क मार्ग उपलब्ध है।
निष्कर्ष
Pashupatinath Temple, Nepal केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और मोक्ष का जीवंत दर्शन है। यह मंदिर मनुष्य को सिखाता है कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है।
जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से Pashupatinath Temple आता है, वह केवल दर्शन नहीं करता — वह जीवन का सत्य समझकर लौटता है।










