ईरान मॉडल से भारत क्या सीख सकता है ? युद्ध के बदले स्वरूप में क्यों भारत को चाहिए रॉकेट‑मिसाइल फोर्स ?

What can India learn from the Iran model?
What can India learn from the Iran model?

What can India learn from the Iran model? दुनिया में चल रहे मौजूदा संघर्ष यह साफ संकेत दे चुके हैं कि पारंपरिक युद्ध अब बीते दौर की बात हो चुके हैं। आज की लड़ाई टेक्नोलॉजी आधारित है, जहां मॉडर्न वॉरफेयर और नॉन‑कॉन्टैक्ट वॉरफेयर निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। भारत ने भी ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस नई युद्ध रणनीति की ताकत दिखाई, जहां पाकिस्तान के अमेरिकी और चीनी हथियार प्रभावी साबित नहीं हो सके। लेकिन भारत यहीं रुकने को तैयार नहीं है। चीन और पाकिस्तान जैसे दो शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों के बीच स्थित भारत को साल भर दो‑मोर्चों के खतरे का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि अब रॉकेट‑मिसाइल फोर्स के गठन पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

सेना दिवस 2026: रॉकेट‑मिसाइल फोर्स की जरूरत पर जोर

भारत 15 जनवरी 2026 को सेना दिवस मना रहा है। इसी अवसर पर एक कार्यक्रम के दौरान भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि मौजूदा सुरक्षा हालात भारत को एक ऐसी स्पेशलाइज्ड मिलिट्री यूनिट की ओर ले जा रहे हैं, जिसमें एक ही कमांड के तहत लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइलें तैनात हों। उनके अनुसार, “पाकिस्तान और चीन पहले ही ऐसी फोर्स बना चुके हैं। मौजूदा समय में भारत के लिए यह एक रणनीतिक आवश्यकता बन चुकी है।”

फिलहाल कौन संभाल रहा है मिसाइल सिस्टम?

अभी भारत में रॉकेट और मिसाइल सिस्टम की जिम्मेदारी अलग‑अलग यूनिट्स के पास है, जैसे:

आर्मी एयर डिफेंस कोर (AAD)

आर्टिलरी रेजिमेंट

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने अपनी लॉन्ग‑रेंज स्ट्राइक क्षमता बढ़ाने पर खास फोकस किया है। सेना प्रमुख के अनुसार, आज के युद्ध में रॉकेट और मिसाइल एक‑दूसरे के पूरक बन चुके हैं।

जहां रॉकेट क्षेत्रीय प्रभाव डालते हैं, वहीं मिसाइलें सटीक लक्ष्य भेदन के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।

भारत के पास कौन‑कौन सी मिसाइलें हैं?

भारतीय सेना के पास इस समय कई स्वदेशी और संयुक्त रूप से विकसित मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं, जिनमें शामिल हैं

अग्नि

ब्रह्मोस

पृथ्वी

प्रलय

इसके अलावा, हाल ही में भारत ने 120 किलोमीटर रेंज वाले पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का सफल परीक्षण किया है। सेना के अनुसार, 300 से 450 किलोमीटर रेंज की मिसाइलों के लिए कॉन्ट्रैक्ट भी साइन हो चुके हैं।

चीन और पाकिस्तान की रॉकेट‑मिसाइल फोर्स

चीन ने पहले ही पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी रॉकेट फोर्स (PLARF) का गठन कर रखा है। अमेरिकी पेंटागन रिपोर्ट के मुताबिक चीन के पास 1,250 से ज्यादा बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं। करीब 600 परमाणु वॉरहेड, जो 2030 तक 1,000 से ज्यादा हो सकते हैं। वहीं पाकिस्तान ने भी ऑपरेशन सिंदूर के बाद आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड (ARFC) बनाई है। हालांकि पाकिस्तान के पास न्यूक्लियर हथियारों की संख्या अधिक मानी जाती है, लेकिन मिसाइल टेक्नोलॉजी में वह भारत से पीछे है।

ईरान मॉडल से भारत क्या सीख सकता है?

अगर भारत रॉकेट‑मिसाइल फोर्स बनाता है, तो ईरान का मॉडल उसके लिए अहम उदाहरण बन सकता है। ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर एयरोस्पेस फोर्स (IRGC‑ASF) मिसाइल, ड्रोन और हाइपरसोनिक हथियारों का संचालन करती है। इस यूनिट की खासियत-

बैलिस्टिक, क्रूज और हाइपरसोनिक मिसाइलों का बड़ा जखीरा

लड़ाकू ड्रोन का संचालन

सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट

टनल नेटवर्क ईरान की सबसे बड़ी ताकत

ईरान की रॉकेट‑मिसाइल फोर्स की सबसे बड़ी ताकत उसका अंडरग्राउंड टनल नेटवर्क है। इन सुरंगों में मिसाइलों को छिपाकर रखा जाता है और जरूरत पड़ने पर वहीं से लॉन्च किया जाता है, जिससे दुश्मन के लिए इन्हें ट्रैक करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इजरायल के साथ हालिया टकराव में ईरान की मिसाइलों ने आयरन डोम जैसी सुरक्षा प्रणाली को भी चुनौती दी, जिससे दुनियाभर का ध्यान इस क्षमता पर गया।

क्यों अमेरिका और इजरायल भी सतर्क रहते हैं?

अमेरिकी अनुमानों के मुताबिक, ईरान के पास करीब 3,000 बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यही ताकत अमेरिका और इजरायल को ईरान के खिलाफ पूर्ण युद्ध से रोकती है। तेजी से बदलते वैश्विक सुरक्षा हालात में भारत के लिए रॉकेट‑मिसाइल फोर्स अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बनती जा रही है। एकीकृत कमांड, आधुनिक तकनीक और लंबी दूरी की मारक क्षमता भारत को रणनीतिक बढ़त दिला सकती है।

Pradeep Dabas

Writer & Blogger

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