
The US has designated the Muslim Brotherhood as a terrorist organization, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिम ब्रदरहुड को आधिकारिक तौर पर आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है। 13 जनवरी को लिए गए इस फैसले के तहत ट्रांसनेशनल सुन्नी इस्लामी संगठन की लेबनान, जॉर्डन और मिस्र में मौजूद शाखाओं को भी आतंकवादी श्रेणी में रखा गया है। यह फैसला वैश्विक राजनीति और मध्य पूर्व की रणनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
क्या है मुस्लिम ब्रदरहुड और कब हुई इसकी स्थापना?
मुस्लिम ब्रदरहुड, जिसे अरबी में जमात अल-इखवान अल-मुस्लिमीन कहा जाता है, की स्थापना वर्ष 1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने की थी। हसन अल-बन्ना पेशे से एक स्कूल शिक्षक थे, जो बाद में एक प्रभावशाली धार्मिक नेता बने। इस संगठन की मूल विचारधारा है — “इस्लाम ही समाधान है”, और इसका उद्देश्य समाज और शासन व्यवस्था में शरिया कानून लागू करना रहा है।
लोकप्रिय और विवादित विचारधारा
मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा अरब और मुस्लिम देशों में लंबे समय तक लोकप्रिय भी रही और विवादों में भी घिरी रही। शुरुआती दौर में संगठन ने सामाजिक और धार्मिक सुधारों पर काम किया, लेकिन धीरे-धीरे इस पर हिंसक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगते गए। हालांकि संगठन के नेता यह दावा करते रहे हैं कि उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है और अब चुनावी व शांतिपूर्ण तरीकों से इस्लामी शासन स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसकी कई शाखाओं के पास आज भी हथियारबंद लड़ाके मौजूद हैं।
हिंसा और राजनीतिक टकराव का इतिहास
मुस्लिम ब्रदरहुड के एक सशस्त्र गुट ने ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और इजरायल के खिलाफ संघर्ष किया था। 1948 में मिस्र के प्रधानमंत्री महमूद फहमी अल-नोकराशी की हत्या में भी इस संगठन की भूमिका सामने आई, जिसके बाद सरकार ने इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया। इसके कुछ समय बाद ही संस्थापक हसन अल-बन्ना की काहिरा में हत्या कर दी गई।
मिस्र में प्रतिबंध, गिरफ्तारी और दमन
1952 में मिस्र में सैन्य तख्तापलट के बाद राष्ट्रपति गमाल अब्देल-नासर की हत्या की साजिश का आरोप भी मुस्लिम ब्रदरहुड पर लगा। इसके बाद संगठन के प्रमुख विचारक सय्यद कुत्ब को फांसी दे दी गई और हजारों कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया। 1970 के दशक में राष्ट्रपति अनवर सादात के कार्यकाल में संगठन को फिर से उभरने का मौका मिला, लेकिन यह दौर भी ज्यादा स्थायी नहीं रहा।
अरब स्प्रिंग के बाद सत्ता और फिर पतन
होस्नी मुबारक के 30 साल लंबे शासन के दौरान मुस्लिम ब्रदरहुड पर सख्त पाबंदियां रहीं । इसके बावजूद 2005 तक यह मिस्र का सबसे मजबूत विपक्षी समूह बन चुका था और संसद में पांच में से एक सीट जीतने में सफल रहा। 2011 के अरब स्प्रिंग के बाद मुबारक को सत्ता से हटाया गया और मुस्लिम ब्रदरहुड सत्ता में आया। मोहम्मद मुर्सी मिस्र के राष्ट्रपति बने, लेकिन उनका शासन ज्यादा समय तक नहीं टिक सका। 2013 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के बाद मिस्र की सेना ने मुर्सी सरकार को हटा दिया और संगठन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई।
संगठन के ज्यादातर वरिष्ठ नेता या तो जेल में हैं या देश से बाहर।
इसके बाद मिस्र ने मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। मौजूदा राष्ट्रपति अब्देल-फतह अल-सिसी के शासन में संगठन से जुड़े या सहानुभूति रखने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी है। ब्रदरहुड के प्रमुख नेता मोहम्मद बदी उम्रकैद की सजा काट रहे हैं और संगठन के ज्यादातर वरिष्ठ नेता या तो जेल में हैं या देश से बाहर।
किन देशों में फैला है मुस्लिम ब्रदरहुड?
मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा से जुड़े लोग दुनिया के कई हिस्सों में मौजूद हैं, लेकिन कई देशों में कानूनी कार्रवाई के डर से वे सक्रिय नहीं हैं। लेबनान की शाखा अल-जमा अल-इस्लामिया को विदेशी आतंकवादी संगठन (FTO) घोषित किया गया है मिस्र और जॉर्डन की शाखाओं को हमास को समर्थन देने के आरोप में वैश्विक आतंकवादी (SDGT) घोषित किया गया है मिस्र, सऊदी अरब, UAE और रूस पहले ही इसे आतंकवादी संगठन मान चुके हैं
अमेरिकी फैसले पर किसने किया समर्थन, किसे लगा झटका?
अमेरिका के इस फैसले का संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने खुलकर स्वागत किया है। इन देशों का मानना है कि मुस्लिम ब्रदरहुड उनकी आंतरिक स्थिरता के लिए खतरा है। वहीं तुर्की के लिए यह फैसला बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन वैचारिक रूप से इस संगठन के समर्थक माने जाते हैं।









