ISRO को बड़ा झटका: मिशन PSLV-C62 तीसरे चरण में फेल

Major setback for ISRO: Mission PSLV-C62 fail
Major setback for ISRO: Mission PSLV-C62 fail

Major setback for ISRO: Mission PSLV-C62 fail, इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) का साल 2026 का पहला अंतरिक्ष मिशन PSLV-C62 / EOS-N1 (अन्वेषा) तकनीकी खराबी के कारण सफल नहीं हो सका। यह रॉकेट 12 जनवरी 2026 को सुबह 10:18 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था।

इस मिशन के तहत कुल 16 सैटेलाइट्स को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जाना था, लेकिन लॉन्च के 8वें मिनट में आई गड़बड़ी के कारण रॉकेट अपना रास्ता भटक गया।

ISRO चीफ का बयान : तीसरे स्टेज में आई तकनीकी समस्या

ISRO प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने बताया कि “रॉकेट की तीसरी स्टेज (PS3) के अंतिम चरण में तकनीकी गड़बड़ी आई, जिसके कारण मिशन अपने निर्धारित मार्ग से भटक गया।” इसी वजह से रॉकेट का चौथा चरण (PS4) सही तरीके से काम नहीं कर पाया। 512 किमी की ऊंचाई पर स्थापित होने थे सैटेलाइट

इस मिशन के तहत :

EOS-N1 (अन्वेषा) और 14 अन्य सैटेलाइट्स

512 किलोमीटर ऊंचाई पर

सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट (SSO) में

स्थापित किए जाने थे।

इसके अलावा  PS4 स्टेज को दोबारा इग्नाइट कर धरती की ओर मोड़ा जाना था । इसके बाद स्पेन के स्टार्टअप का KID (Kestral Initial Technology Demonstrator) कैप्सूल अलग होना था लेकिन तकनीकी खराबी के कारण ये सभी चरण पूरे नहीं हो सके।

मिशन के 8वें मिनट में क्या-क्या गलत हुआ?

PSLV-C62 / EOS-N1 मिशन की कुल अवधि 1 घंटा 48 मिनट 5 सेकेंड तय थी, लेकिन 8वें मिनट में आई खराबी के कारण

PS4 स्टेज का इग्निशन पूरी तरह सफल नहीं हुआ

EOS-N1 समेत 16 सैटेलाइट्स ऑर्बिट में इंजेक्ट नहीं हो सके

री-एंट्री बर्न और KID सेपरेशन जैसे इवेंट्स रद्द हो गए

ISRO ने फिलहाल मिशन को न तो पूरी तरह सफल और न ही पूरी तरह असफल घोषित किया है, लेकिन तकनीकी तौर पर इसे मिशन फेल्योर माना जा रहा है।

अब आगे क्या होगा? 3 सवालों में समझिए

रास्ता भटकने के बाद रॉकेट का क्या होता है?

रॉकेट के ऑनबोर्ड कंप्यूटर और सेफ्टी सिस्टम लगातार निगरानी करते हैं

अगर रॉकेट जमीन या आबादी के लिए खतरा बने, तो Flight Termination System से उसे नष्ट किया जा सकता है ऊंचाई पर खराबी होने की स्थिति में रॉकेट के हिस्से समुद्र में गिर जाते हैं। ऐसे मामलों में रॉकेट को दोबारा नियंत्रित करना संभव नहीं होता ।

सैटेलाइट्स का क्या हुआ?

अगर सैटेलाइट में अलग होने से पहले गड़बड़ी आई तो  सैटेलाइट रॉकेट के साथ ही नष्ट या समुद्र में गिर जाते हैं । अगर गलत कक्षा में चले गए तो ऑर्बिट सुधारने की कोशिश होती है, लेकिन अधिक गड़बड़ी होने पर उन्हें अनुपयोगी घोषित कर दिया जाता है । इस मिशन में सभी सैटेलाइट्स रॉकेट के साथ भटक गए, इसलिए उन्हें बचाना संभव नहीं है।

क्या यह ISRO के लिए बड़ी विफलता है?

तकनीकी रूप से यह पूर्ण मिशन विफलता मानी जा सकती है

लेकिन ISRO के लिए यह सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है

इससे पहले भी PSLV मिशनों में गड़बड़ियां आई हैं, जिनसे सिस्टम और मजबूत हुआ

PSLV: दुनिया के सबसे भरोसेमंद रॉकेट्स में शामिल

PSLV को ISRO का सबसे भरोसेमंद रॉकेट माना जाता है:

अब तक 63 सफल उड़ानें

चंद्रयान-1, मंगलयान, आदित्य-L1 जैसे ऐतिहासिक मिशन

2017 में 104 सैटेलाइट एक साथ लॉन्च कर वर्ल्ड रिकॉर्ड

अन्वेषा: दुश्मनों पर नजर रखने वाला हाई-टेक जासूसी सैटेलाइट

EOS-N1 (अन्वेषा) को DRDO ने विकसित किया था। यह:

जंगलों, झाड़ियों और बंकरों में छिपे दुश्मनों की पहचान कर सकता था

एडवांस्ड हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक से लैस था

सैन्य और सुरक्षा निगरानी के लिए बेहद अहम माना जा रहा था

HySIS टेक्नोलॉजी में भारत की बड़ी छलांग

भारत समेत अब तक 6 से ज्यादा देश हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट लॉन्च कर चुके हैं

भारत ने 2018 में पहला HySIS सैटेलाइट लॉन्च किया था

अन्वेषा, HySIS का अपग्रेडेड और ज्यादा पावरफुल वर्जन था

यह भी पढ़ें : सरकार की सख्ती के आगे X को झुकना पड़ा, Grok AI पर कार्रवाई स्वीकार

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