
America take control of Greenland? अमेरिकी प्रशासन ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर बड़ा और विवादित बयान दिया है। व्हाइट हाउस ने साफ संकेत दिए हैं कि अमेरिका ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने के लिए हर विकल्प पर विचार कर रहा है, जिसमें सैन्य कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। इस बयान के बाद डेनमार्क ही नहीं, बल्कि पूरे NATO में हड़कंप मच गया है।
व्हाइट हाउस का क्या कहना है?
BBC के मुताबिक, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम मानते हैं। उनका तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी अमेरिका के लिए खतरा बन सकती है। इसी वजह से प्रशासन ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए अलग-अलग रास्तों पर चर्चा कर रहा है। लेविट ने यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी, तो अमेरिकी राष्ट्रपति के पास सेना के इस्तेमाल का अधिकार भी है।
ट्रंप पहले भी जता चुके हैं ग्रीनलैंड पर दावा
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात की हो। इससे पहले भी वे कई बार कह चुके हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका की “फ्रंट लाइन सिक्योरिटी” है। हाल ही में ट्रंप ने कहा था कि वह अगले 20 दिनों में ग्रीनलैंड को लेकर बड़ा फैसला ले सकते हैं।
खरीद या कब्जा? अमेरिका की रणनीति
हालांकि, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सैन्य कार्रवाई की बात से थोड़ी दूरी बनाते हुए कहा कि अमेरिका का इरादा हमला करने का नहीं है। उनका कहना है कि प्रशासन की प्राथमिकता अब भी डेनमार्क से ग्रीनलैंड को खरीदने या फिर ग्रीनलैंड के साथ कोई विशेष समझौता करने की है। एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, अमेरिका ग्रीनलैंड के लोगों के साथ “फायदेमंद और दीर्घकालिक रिश्ते” बनाना चाहता है।
ग्रीनलैंड और डेनमार्क का कड़ा विरोध
ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और NATO का हिस्सा भी है। यहां करीब 57 हजार लोग रहते हैं। ग्रीनलैंड की अपनी कोई सेना नहीं है, उसकी रक्षा और विदेश नीति डेनमार्क के हाथ में है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने अमेरिका के बयान को असम्मानजनक बताया और कहा कि किसी भी तरह की बातचीत सम्मानजनक तरीके से होनी चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि ग्रीनलैंड के लोग “बिकाऊ नहीं हैं”।
वहीं, डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर हमला किया, तो यह NATO के अंत की शुरुआत होगी। उन्होंने कहा कि NATO का नियम है—एक सदस्य पर हमला, सभी पर हमला माना जाता है।
NATO में क्यों मचा बवाल?
इस पूरे विवाद को गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड – तीनों NATO के सदस्य हैं । अगर अमेरिका सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह इतिहास में पहली बार होगा जब एक NATO देश, दूसरे NATO देश पर हमला करेगा। यूरोप के कई देशों—ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन और पोलैंड—ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि ग्रीनलैंड उसके लोगों का है और उसके भविष्य का फैसला वही करेंगे।
अमेरिका को ग्रीनलैंड से क्या चाहिए
विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका की दिलचस्पी के पीछे कई बड़े कारण हैं
रणनीतिक सैन्य महत्व: आर्कटिक क्षेत्र में मिसाइल और स्पेस निगरानी
रूस-चीन पर नजर: बढ़ती गतिविधियों को रोकना
प्राकृतिक संसाधन: रेयर अर्थ मिनरल्स, तेल और गैस
नई शिपिंग रूट्स: बर्फ पिघलने से खुलते समुद्री रास्ते
राष्ट्रीय सुरक्षा: भविष्य के खतरों को पहले रोकने की रणनीति
क्या NATO टूटने की कगार पर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर ट्रंप प्रशासन ने ग्रीनलैंड पर जबरदस्ती कदम उठाया, तो इससे NATO की एकता को गहरा झटका लग सकता है। अब तक NATO रूस से निपटने की तैयारी कर रहा था, लेकिन इस विवाद ने खतरा अंदर से पैदा कर दिया है।









