
Difference between Modi’s words and actions, अरावली पर्वत श्रंखला पर नई परिभाषा को लेकर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने जमकर निशाना साधा है । जयराम रमेश ने कहा कि पीएम मोदी की कथरी और करनी में कोई मेल नहीं है । मोदी की पर्यावरण संबंधी जो चिंताएं है वह केवल दिखावा है । जयराम रमेश ने यह दावा किया कि क्षेत्रफल के लिहाज से इसका मतलब है कि नई परिभाषा के तहत अरावली का 90% से अधिक हिस्सा संरक्षित नहीं माना जाएगा और भविष्य में खनन, रियल एस्टेट और अन्य गतिविधियों के लिए खोला जा सकता है, जिससे पहले से ही बर्बाद हो रहे इस पारिस्थितिकी तंत्र को और नुकसान पहुंचेगा।
अरावली की पुनर्परिभाषा खतरनाक, विनाशकारी
रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया मोदी सरकार द्वारा अरावली की नई परिभाषा, जो सभी विशेषज्ञों की राय के विपरीत है, खतरनाक और विनाशकारी है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के अधिकारिक डेटा के अनुसार, 20 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली अरावली पहाड़ियों में से केवल 8.7% ही 100 मीटर से ऊंची हैं। यदि हम FSI द्वारा चिन्हित सभी अरावली पहाड़ियों को देखें, तो उनमें से 1% भी 100 मीटर से ऊंची नहीं है। FSI का मानना है — और यह सही भी है — कि ऊंचाई के आधार पर संरक्षण तय करना तर्कसंगत नहीं है, इसलिए अरावली की सभी पहाड़ियों, चाहे उनकी ऊंचाई कुछ भी हो, संरक्षण के योग्य हैं।
पर्यावरणीय शासन संस्थाओं का कमजोर किया जा रहा है
यही सीधी और निर्विवाद सच्चाई है जिसे छुपाया नहीं जा सकता। यह मोदी सरकार द्वारा पारिस्थितिक संतुलन पर निरंतर प्रहार का एक और उदाहरण है। इसमें प्रदूषण मानकों में ढील, पर्यावरण एवं वन कानूनों को कमजोर करना, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और अन्य पर्यावरणीय शासन संस्थाओं का कमजोर होना शामिल है। प्रधानमंत्री के वैश्विक मंचों पर दिए जाने वाले पर्यावरण संरक्षण संबंधी भाषण और देश में की जाने वाली वास्तविक कार्रवाई में किसी प्रकार की समानता नहीं दिखती।









